लोक मंगल: विचार दंगल
यहां लोक शब्द से मतलब बहुसंख्यक, आम आदमी से है। कुछ लोग अपनी अलग सुरक्षित दुनिया में रहना पसंद करते हैं। उनका अपना लोक है, अपनी दुनिया है। वह आकार एवं प्रकार दोनों में छोटा है। इसी तरह लोक अनेक हो सकते हैं और लोक शब्द के अनेक अर्थ भी है। इसलिये स्पष्ट किया गया है कि हम तो उस लोक का मंगल मना रहे हैं, जिस लोक में सारे छोटे-बड़े लोक समा सकते हैं। अनेक अल्पज्ञों के बीच कुछ बुद्धिमान भी रहें, उनका भी मंगल हो।
चूंकि मनुष्य न तो केवल अपनी मर्जी से पैदा होता है, न केवल अपने बल पर जीता है। मरने में भी कई बार दूसरों की भूमिका रहती है। इस प्रकार लोक के साथ मनुष्य के रिश्तों को उसकी तमाम विविधताओं के साथ समझा जा सकता है।
दूसरों का लोक परलोक कहलाता है। इस संसार में और मरने के बाद भी दूसरों के लोक में जाया जा सकता हैं परंतु अपनापन के अभाव में अनेक सुख-सुविधाओं के बाद भी कुछ खटकता रहता है। इसलिये भारत में कुछ लोग स्वर्ग में जाना ही नहीं चाहते। स्वर्ग में नौकर बनने से अच्छा इस लोक में स्वतंत्र रहना ही है। वहां भी तो दुख है। मालिक वहां भी अत्याचारी है। यक्षों, अप्सराओं की कथाएं यही तो सुना रही हैं फिर भी अनेक लोग स्वर्ग जाने के प्रयास में हजारों साल से लगे हुए हैं। इसलिये हम अमीरों की वैसी दुनिया के पक्ष में नहीं हैं जहां दासता, सत्ता के समाप्त होने का संकट बना रहे और उस पर काबिज रहने के लिये रोज आदमी खुद भी तनाव में रहे और दूसरों को भी खतरे में डालता रहे।
सांख्य दर्शन वाले उन पुराने लोगों में हैं, जिनने ठीक ही समझा कि स्वर्ग में भी संकट है। क्यों वहां जा कर नए संकट में पड़ें। ‘‘ दृष्टवदानुश्रविकः स ह्यविशुद्धिक्षयाशतिशययुक्तः’’ सांख्य कारिका
दृष्ट- दिखाई देने वाले (इस संसार ) वत् - की तरह आनुश्रविकः - वेदों में वर्णित श्रुति आधारित स्वर्ग भी है। वह भी स ह्यविशुद्धिक्षयाशतिशययुक्तः- अविशुद्धि - पूर्णतः शुद्ध न होना, क्षय नष्ट होना एवं अतिशय - कम अधिक सुख वाला होना इन दोषों से युक्त है।
इसका दंड यक्ष, यक्षिणियां एवं अप्सराएं तथा गंधर्व भोगते हैं। इन्द्र आदि देवता भी आदमी से डरे ही रहते हैं।
इससे अच्छा सुख-दुख से भरा पूरा विविधताओं एवं संभावनाओं वाला आम आदमी का लोक है, जहां रचनात्मकता, सक्रियता, प्रयास, लेन-देन, शिकवा-शिकायत, मान-मनौवल एवं सामंजस्य की पर्याप्त गुंजाइस है।
इस लोक का मंगल कैसे हो? और वह मंगल क्या है? यह विचारणीय है। इस देश में शब्द बेचारे इतनी बार पिटे और कुछ इस तरह घिसे कि उनका भी कायाकल्प करना पड़ता है। यहां मंगल मुख्यतः भौतिक अर्थों में लिया गया है। मनुष्य की बुनियादी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के संसाधनों के साथ सबका रचनात्मक, प्रसन्न एवं स्वस्थ रहना मंगल का सहज अर्थ है। इस अर्थ का विस्तार भी किया जा सकता है।
इसी मंगल भावना एवं मंगल कामना के साथ विचारों का दंगल आयोजित हो रहा है। बेशक यह एक अखाड़े की तरह है, जहां सबको वर्जिश करने की छूट है पर घ्यान रखें कि इस अखाड़े के कुछ अलग नियम हैंः-
1 यहां न तो पहले से कोई विजेता तय है न कोई पुरस्कार।
2 आप मान सकते हैं कि कुछ लोग बेमतलब का काम कर रहे हैं फिर भी इस प्रक्रिया से अगर किसी को लाभ मिल जाये तो दंगल के आयोजकों को कोई परेशानी नहीं है।
3 आप चाहें तो अखाड़े में उतरें या अलग से नजारा देखें लेकिन अखाड़े की घूल कहां तक उड़ेगी और कहां पर गिरेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है।
4 फिलहाल इस दंगल में 5 लोग शामिल हैं। 5 से 25, और, फिर और...।
यहां लोक शब्द से मतलब बहुसंख्यक, आम आदमी से है। कुछ लोग अपनी अलग सुरक्षित दुनिया में रहना पसंद करते हैं। उनका अपना लोक है, अपनी दुनिया है। वह आकार एवं प्रकार दोनों में छोटा है। इसी तरह लोक अनेक हो सकते हैं और लोक शब्द के अनेक अर्थ भी है। इसलिये स्पष्ट किया गया है कि हम तो उस लोक का मंगल मना रहे हैं, जिस लोक में सारे छोटे-बड़े लोक समा सकते हैं। अनेक अल्पज्ञों के बीच कुछ बुद्धिमान भी रहें, उनका भी मंगल हो।
चूंकि मनुष्य न तो केवल अपनी मर्जी से पैदा होता है, न केवल अपने बल पर जीता है। मरने में भी कई बार दूसरों की भूमिका रहती है। इस प्रकार लोक के साथ मनुष्य के रिश्तों को उसकी तमाम विविधताओं के साथ समझा जा सकता है।
दूसरों का लोक परलोक कहलाता है। इस संसार में और मरने के बाद भी दूसरों के लोक में जाया जा सकता हैं परंतु अपनापन के अभाव में अनेक सुख-सुविधाओं के बाद भी कुछ खटकता रहता है। इसलिये भारत में कुछ लोग स्वर्ग में जाना ही नहीं चाहते। स्वर्ग में नौकर बनने से अच्छा इस लोक में स्वतंत्र रहना ही है। वहां भी तो दुख है। मालिक वहां भी अत्याचारी है। यक्षों, अप्सराओं की कथाएं यही तो सुना रही हैं फिर भी अनेक लोग स्वर्ग जाने के प्रयास में हजारों साल से लगे हुए हैं। इसलिये हम अमीरों की वैसी दुनिया के पक्ष में नहीं हैं जहां दासता, सत्ता के समाप्त होने का संकट बना रहे और उस पर काबिज रहने के लिये रोज आदमी खुद भी तनाव में रहे और दूसरों को भी खतरे में डालता रहे।
सांख्य दर्शन वाले उन पुराने लोगों में हैं, जिनने ठीक ही समझा कि स्वर्ग में भी संकट है। क्यों वहां जा कर नए संकट में पड़ें। ‘‘ दृष्टवदानुश्रविकः स ह्यविशुद्धिक्षयाशतिशययुक्तः’’ सांख्य कारिका
दृष्ट- दिखाई देने वाले (इस संसार ) वत् - की तरह आनुश्रविकः - वेदों में वर्णित श्रुति आधारित स्वर्ग भी है। वह भी स ह्यविशुद्धिक्षयाशतिशययुक्तः- अविशुद्धि - पूर्णतः शुद्ध न होना, क्षय नष्ट होना एवं अतिशय - कम अधिक सुख वाला होना इन दोषों से युक्त है।
इसका दंड यक्ष, यक्षिणियां एवं अप्सराएं तथा गंधर्व भोगते हैं। इन्द्र आदि देवता भी आदमी से डरे ही रहते हैं।
इससे अच्छा सुख-दुख से भरा पूरा विविधताओं एवं संभावनाओं वाला आम आदमी का लोक है, जहां रचनात्मकता, सक्रियता, प्रयास, लेन-देन, शिकवा-शिकायत, मान-मनौवल एवं सामंजस्य की पर्याप्त गुंजाइस है।
इस लोक का मंगल कैसे हो? और वह मंगल क्या है? यह विचारणीय है। इस देश में शब्द बेचारे इतनी बार पिटे और कुछ इस तरह घिसे कि उनका भी कायाकल्प करना पड़ता है। यहां मंगल मुख्यतः भौतिक अर्थों में लिया गया है। मनुष्य की बुनियादी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के संसाधनों के साथ सबका रचनात्मक, प्रसन्न एवं स्वस्थ रहना मंगल का सहज अर्थ है। इस अर्थ का विस्तार भी किया जा सकता है।
इसी मंगल भावना एवं मंगल कामना के साथ विचारों का दंगल आयोजित हो रहा है। बेशक यह एक अखाड़े की तरह है, जहां सबको वर्जिश करने की छूट है पर घ्यान रखें कि इस अखाड़े के कुछ अलग नियम हैंः-
1 यहां न तो पहले से कोई विजेता तय है न कोई पुरस्कार।
2 आप मान सकते हैं कि कुछ लोग बेमतलब का काम कर रहे हैं फिर भी इस प्रक्रिया से अगर किसी को लाभ मिल जाये तो दंगल के आयोजकों को कोई परेशानी नहीं है।
3 आप चाहें तो अखाड़े में उतरें या अलग से नजारा देखें लेकिन अखाड़े की घूल कहां तक उड़ेगी और कहां पर गिरेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है।
4 फिलहाल इस दंगल में 5 लोग शामिल हैं। 5 से 25, और, फिर और...।
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